रजस्वला पर्व


*सरायकेला: प्रकृति एवं नारीत्व को समर्पित रज पर्व का रहा उल्लास*

*दीपक कुमार दारोघा*

सरायकेला: प्रकृति को समर्पित रज पर्व में सरायकेला खरसावां सहित विभिन्न क्षेत्र में उल्लास का माहौल रहा।

ओड़िशा सहित झारखंड के इलाके में इस पर्व का खास महत्व रहा है। मान्यता है कि मानसून से पूर्व धरती माता महावारी (रजवती) से गरजती है। नारीत्व एवं कृषि भूमि को समर्पित इस उत्सव में लड़कियां, महिलाएं घरेलू कामकाज रोक कर आराम करते हैं। यहां तक कि इन्हें झूला में भी बैठाया जाता है। झूला में बैठ कर वह मन की खुशी को ललित कलित माध्यम से बयां करते हैं। जिसे ओड़िया भाषा में गीत भी कहा जाता है। "वनस्ते डाकिला गज,बरसे के थरे आसीछी रज"अर्थात जंगल में हाथी ने दी आवाज, साल में एक बार आया है रज पर्व। रजवती, ऋतुमति (माहवारी) उत्सव नारी एवं प्रकृति संबंध को भी दर्शाता है। प्राचीन काल से चली आ रही यह पर्व नारी के सम्मान को भी दर्शाता है। रज पर्व में लड़कियां, महिलाएं झूला खेलने में मशगूल रहे। लोगों ने बंधु कुटुंब को रज पर्व की बधाइयां भी दी। बच्चों नेे भी इस पर्व का भरपूर आनंद उठाया।

मिथुन संक्रांति या रज संक्रांति में पर्व का उत्कर्ष रहा। तरह-तरह के व्यंजन भी घरों में बनी। पुड़ो पीठा हो या मीठा या फिर रज गीत लोगों ने अपने ढंग से आनंद उठाया।

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