अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस

 

 *जनता की आवाज बनने वाले पत्रकार, साहित्यकार की सुधि लेने वाला कोई नहीं, चाहे वो हिक्की हो या कालिदास*

 *दीपक कुमार दारोघा* 

सरायकेला: मुक जनता की आवाज बनकर गणतंत्र में सत्ता तक हिलने वाले पत्रकार, साहित्यकार समाज को आईना दिखाने का काम कर रहे हैं मगर उनका जीवन?

एक समय था गुलाम भारत में अंग्रेज पत्रकार जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने भारतीयों के हक में अपने लेखनी के जरिए अंग्रेज सत्ता को हिलाने का काम किया था। उन्होंने 1780 में बेंगल गैजेट शुरू किया था। उनका अंतिम जीवन कोलकत्ता की गलियों में भूखे प्यासे बीता। उन्हें पत्रकारिता का पितामह भी कहा जाता है। भले ही इसे काल्पनिक मान लें मगर मेघदूतम,शकुंतलम के रचनाकार, प्रसिद्ध साहित्यकार कालिदास का अंतिम जीवन कष्टदायक रहा। प्रसिद्ध साहित्यकार मोहन राकेश ने कालिदास की जीवनी पर आधारित एक नाटक लिखा था (1958) "आषाढ़ का एक दिन“।

इसके मुताबिक पात्र कालिदास बचपन से पशु पक्षी प्रेमी रहे। वह जंगल में जहां भी कविताएं गुनगुनाते थे। पशु पक्षी उनके आसपास टहलते श्रवण करते थे। गांव की एक लड़की भी उनकी कविताएं सुनती। धीरे-धीरे उस लड़की से उनका प्रेम हो जाता। युवावस्था का दहलीज पहुंचते ही कालिदास के पिता कहने लगे कि कुछ काम करो। परिवार चलाओगे कैसे? इधर इनकी कविताओं की चर्चा गांव से राज्य स्तर तक होने लगती है। एक दिन राजा ने उनके पास संदेश भेजा। वह राज दरबार में हाजिर हुए। राजा ने इन्हें राज कवि का दर्जा दिया। दरबार में प्रतिदिन रहना पड़ता। गांव की प्रेम कहानी न चाहते हुए भी छूट रही थी। उन्होंने राज दरबार में कई रचनाएं लिखी। और दरबार में पेश किया। राजा खुश हुए एवं उनसे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। साथ ही कश्मीर का सूबेदार बना दिया। वह पत्नी संग कश्मीर में रहने लगे। पत्नी की राजनीतिक सोच एवं साहित्यकार की सोच मेल नहीं हुआ । वह अपनी पत्नी की जीवन शैली से परेशान रहे। और एक दिन आषाढ़ महीने के रात चुपके से भागे। भागते हुए वह अपने गांव पहुंचे और प्रेमिका के घर दस्तक दी। प्रेमिका निकली। दोनों ने एक दूसरे को देखा। कालिदास कुछ कह पाते की अंदर से बच्चे की रोने की आवाज आई। उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि प्रेमिका की भी शादी हो चुकी है। वह दरवाजे से ही लौटे। अंतिम जीवन कैसे बीता? 

अब तो प्रेस प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या डिजिटल मीडिया का युग है। इनके माध्यम से पत्रकार, साहित्यकार समाज में विभिन्न बिंदुओं पर जागरूकता फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। यहां तक कि असंगठित पत्रकारों का काफिला देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं। डिजिटल मीडिया के इस युग में गांव से सत्ता तक जनता की आवाज पहुंच रही है। मगर इन असंगठित साहित्यकार,पत्रकारों का सुधी लेने वाला कोई नहीं है। समाज को आईना दिखाने वाले ऐसे असंगठित साहित्यकार, पत्रकारों का बुढ़ापा कैसे कटेगी पता नहीं। केवल देश नहीं विश्व भर में शिक्षा, संस्कृति, शांति का पैगाम देने वाले पत्रकार, साहित्यकार अब भी अपने कर्म के प्रति सक्रिय है।

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