*भारतीय नृत्य केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं, अध्यात्म भी है*
*दीपक कुमार दारोघा*
सरायकेला: भारतीय नृत्य कला केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि इसका एक और आयाम अध्यात्म भी है। इसकी आभास हमें विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य से मिलता है।
भारत में प्रधानत नृत्य की तीन शैलियां प्रचलित है। शास्त्रीय नृत्य, लोक नृत्य एवं आदिवासी नृत्य शैली। शास्त्रीय नृत्य में गति ताल का समावेश एवं सामंजस्य होता है। इसके अंतर्गत भरतनाट्यम, कथकली,कत्थक,मणिपुरी सरायकेला छऊ आदि आते हैं।
लोक नृत्य भारतीय ग्रामीण जीवन की प्राचीन नृत्य शैली है। जो खासकर पर्व त्योहारों के मौके पर देव पुजनों एवं सामाजिक धार्मिक अवसरों पर देखने को मिलता है। इसके अंतर्गत बिहू, घूमर, गरबा भांगड़ा आदि प्रमुख है।
आदिवासी नृत्य शैली आदिवासियों के द्वारा देवता पूजन या त्योहारों के अवसर पर एवं नृत्य संगीत में अपनाई जाती है। इसके अंतर्गत लाल हरवा, संथाली,कुंभी आदि आते हैं।
इन सभी नृत्य शैलियों में शास्त्रीय नृत्य शैलियों की प्रधानता है। इसका उद्धव देवदासी नृत्य प्रथा या राजा महाराजाओं के दरबार में विकसित हुआ। माना जाता है कि यह नृत्य पहले लोक नृत्य था बाद में शास्त्रीय नृत्य में परिवर्तित हुआ।
भारत सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय ने छऊ को शास्त्रीय कला की मान्यता दी है। इसको लेकर सरायकेला छऊ कला के कला प्रेमी, कलाकार उत्साहित है। छऊ कला वर्ष 1938 से ही सरायकेला प्रिंसली स्टेट से निकलकर विश्व में भारतीय कला संस्कृति का बखान करने में महारथ हासिल की है। देश में छऊ को शास्त्रीय मान्यता मिलने पर कलाकारों को आस जगी कि अब प्रति स्टेज उन्हें शास्त्रीय कलाकार के अनुरूप राशि प्राप्त होंगे।
बसंत ऋतु के चैत्र महीना में धार्मिक अनुष्ठानों से परिपूर्ण सरायकेला में होती है चैत्र पर्व (छऊ महोत्सव)। झारखंड (सरायकेला) में इन दोनों मनाया जा रहा राजकीय चैत्र पर्व सह छऊ महोत्सव।

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