पर्यटन


 *सरायकेला: छऊ की प्राचीन आखड़ा भैरव पीठ स्थली है पर्यटनीय विकास से दूर*

 *दीपक कुमार दारोघा* 

सरायकेला: खरकाई नदी तट पर स्थित भैरव पीठ स्थली विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य का रहा प्राचीन आखड़ा। भैरव देव की अपूर्व महिमा के कारण सरायकेला प्रिंसली स्टेट से लेकर गणतंत्र देश में अब भी इस प्राकृतिक खुशनुमा स्थान पर भैरव देव के प्रति लोगों की आस्था रही है। यहां तक कि चैत्र पर्व (छऊ उत्सव) के अवसर पर कलाकार, कला प्रेमी, पर्यटक भी इस भैरव पीठ स्थली में पहुंचते हैं, पूजा अर्चना करते हैं एवं जगत नर्तक के प्रति आस्था व्यक्त करते है। यूनेस्को ने भले ही छऊ को इनटेंजिबल कल्चरल हेरिटेज घोषित किया है लेकिन वर्षों बाद भी विश्व प्रसिद्ध छऊ कला की धरती सरायकेला में यह भैरव पीठ स्थली(प्राचीन आखड़ा) पर्यटनीय विकास से दूर है।

जानकारी के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला अंतर्गत इंदोरा तहसील के काठगढ़ शिव मंदिर में दो स्वरूप में शिवलिंग है। इस शिव मंदिर में शिव की अपूर्व महिमा है। शिवलिंग दो भागों में बंटा है। अर्धनारीश्वर स्वरूप की आराधना होती है। विश्व का एकमात्र अर्धनारीश्वर शिव मंदिर कहा जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक 326 ईसा पूर्व में सिकंदर ने भारतीय उपमहाद्वीप पर आक्रमण किया था। इस स्थान से मेसोडोनिया (उत्तरी यूनान) के सिकंदर महान भारत विजय सपना अधूरा छोड़कर वापस लौटे। बीमारी के कारण रास्ते में ही उनकी मौत हो गयी। उक्त शिवलिंग खुले आसमान के नीचे था। बाद में मंदिर बनी।

विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य की धरती सरायकेला में भी खरकाई नदी तट पर स्थित भैरव पीठ स्थली खुले आसमान के नीचे है। यह प्राचीन छऊ मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण स्थल भी रहा है। प्रिंसली स्टेट के समय यह नुआगढ़ आखड़ा के रूप में भी परिचित था। राजा राजवाड समय से सरायकेला में शिव की अपूर्व महिमा रही है। सरायकेला छऊ की उत्पत्ति का रहस्य भी इसी में छुपा है। शिव की आराधना उपासना के साथ चैत्र पर्व की धार्मिक अनुष्ठान शुरू होती है। धर्म, आध्यात्म से परिपूर्ण चैत्र पर्व की शुरुआत अप्रैल की पहले सप्ताह से शुरू होने वाली है। अप्रैल 5 को भैरव देव (जगत नर्तक) की पूजा अर्चना होगी।

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