दुर्गोत्सव

 

*सरायकेला:राजा रजवाड़ समय से शुरू हुई दुर्गोत्सव में अब भी शक्ति रुपिणी के प्रति लोगों का है आस्था, मध्य रात्रि को होगी महामेरू रस्म*

*दीपक कुमार दारोघा*

सरायकेला: जिला मुख्यालय सरायकेला में दिनभर भक्त श्रद्धालुओं का रुख मंदिर, पूजा पंडालों की ओर रहा एवं शक्ति रुपिणी के प्रति लोगों का आस्था बनी हुई है।

भक्त श्रद्धालुओं ने अष्टमी में उपासना पूर्वक माता दुर्गा की पूजा अर्चना की। एवं माता दुर्गा के प्रति आस्था जताया। जानकारी के मुताबिक सरायकेला पहले प्रिंसली स्टेट था। उस समय क्षेत्र में सैनिक, योद्धा परिवारों के घरों में भी माता दुर्गा की पूजा होती थी। जो अभी वीरले ही देखने को मिलता है। सप्तमी को अस्त्र-शस्त्र साफ कर माता दुर्गा के चरणों में रखकर पूजा करते थे। और तिथिवार पूजा अर्चना के बाद विजयदशमी को पूजा मंडप में ढाल तलवार लिए अपराजिता धारण कर फरिखंडा नृत्य करते थे। सुख समृद्धि विजय की कामना के साथ इसका समापन होती थी।

शनिवार सप्तमी को एक पूजा रस्म देखने को मिला। सरायकेला पैलेस से राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव के नेतृत्व में पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र लिए एक झुंड निकला। इसमें योद्धा परिवार के लोग शामिल थे। झुंड खरकाई नदी के माजणा घाट पहुंचा। जहां लोगों ने पारंपरिक ढाल तलवार (अस्त्र-शस्त्र)साफ की। और लौट कर माता दुर्गा के चरणों में अस्त्र-शस्त्र रखकर विधिवत पूजा अर्चना प्रारंभ की।

पहले सरायकेला प्रिंसली स्टेट के समय में गांव को लेकर पीढ़ हुआ करता था। कुचुंग पीढ़, ईचा पीढ़, दुगनी पीढ़, गम्हरिया पीढ़, कांड्रा पीढ़ आदि। पीढ़ क्षेत्र में रहने वाले सैनिक परिवारों को गंहदल भी कहा जाता था। राजा द्वारा गंहदल को जमीन भी दिया जाता था। गंहदल के जमीन की खरीद बिक्री नहीं होती थी। अब भी खतियानों में गंहदल शब्द है। पर कई मामलों में सैनिक परिवारों की जमीन दूसरे के कब्जे में है। आर्थिक अनाटन के बावजूद तत्कालीन सैनिक, योद्धा परिवारों के नई पीढ़ी शक्ति रूपिणी की पूजा रस्म को पूरा करने में जुटे हैं। घरों से निकल रही शंख ध्वनि यह जताने के लिए काफी है कि लोग शक्ति रुपिणी की पूजा में जुटे हैं। मध्य रात्रि को संपन्न होगी महामेरू पूजा रस्म। विभिन्न पूजा पंडालों में भी महाष्टमी की पूजा जारी है।

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